Volume: 3 Issue: 3 (July - September 2026)
| Sr No. | Paper Information |
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| 1 |
Author(s):
डॉ. आरती देवराड़ी.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
1-7 |
हिन्दी के प्रमुख प्रयोगवादी काव्यों में युद्ध एवं शांति के संदर्भAbstractशोध सार- हिंदी साहित्य की प्रयोगवादी काव्य धारा युद्ध और शांति की अवधारणाओं के बहुआयामी स्वरूप का विश्लेषण करती है। हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद स्वतंत्रता के बाद उभरने वाली वह काव्यधारा है, जिसमें कवियों ने पारंपरिक भावबोध शिल्प और विषयवस्तु से हटकर आधुनिक मनुष्य की जटिल अनुभूतियों, आंतरिक संघर्षों तथा वैश्विक यथार्थ को अभिव्यक्त किया। युद्ध और शांति इस काव्य धारा में केवल राजनीतिक या ऐतिहासिक घटनाएं न होकर मानव मन के आंतरिक संघर्ष, सामाजिक विघटन और अस्तित्वगत संकट के प्रतीक के रूप में उपस्थित हुई हैं। प्रयोगवादी कवियों हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, भवानी प्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती ने युद्ध को बाहरी हिंसा से अधिक मानसिक तनाव, नैतिक पतन और मानवीय मूल्यों के क्षरण के रूप में चित्रित किया है। इनके काव्य में युद्ध आधुनिक सभ्यता की अमानवीय प्रवृतियों, सत्ता संरचनाओं और वैचारिक टकराव का प्रतीक बनकर उभरता है। विशेष रूप मे मुक्तिबोध के काव्य में युद्ध का स्वरूप सामाजिक अन्याय, वर्ग संघर्ष और वैचारिक अराजकता के रूप में दिखाई देता है, जो मनुष्य को निरन्तर आत्म संघर्ष की स्थिति में डाल देता है; दूसरी ओर प्रयोगवादी काव्य में शांति की अवधारणा पारंपरिक आदर्शवाद से अलग हटकर आत्मिक संतुलन,चेतना, जागरूकता और नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ी हुई जान पड़ती है। यह शांति बाह्य परिस्थितियों से अधिक मनुष्य के भीतर घटित होने वाली प्रक्रिया है। अज्ञेय के काव्य में शांति की अवधारणा स्वतंत्र चेतना, आत्म अन्वेषण,के माध्यम से अभिव्यक्त होती है, जबकि शमशेर के काव्य में यह संवेदनशीलता, मानवीय करुणा और सौंदर्य बोध के रूप में उपस्थित हैं। इस प्रकार प्रयोगवादी काव्य युद्ध और शांति की अवधारणा को द्वंदात्मक रूप में प्रस्तुत करता है; जहाँ युद्ध विघटन और संकट का बोध कराता है, वहीं शांति संभावित मुक्ति और मानवीय पुनर्निर्माण की आशा जगाती है। यह काव्यधारा आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में मनुष्य की भूमिका, जिम्मेदारी और संवेदनहीनता पर गहन प्रश्न उठाती है। | |
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Author(s):
Dr. Surendra Kumar.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
8-13 |
डॉ. रांगेय राघव के ‘देवकी का बेटा’ उपन्यास में कृष्ण-चरित की आधुनिक जीवन-दृष्टिAbstractहिन्दी के सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. रांगेय राघव ने जीवनीपरक उपन्यास-विधा को एक नवीन वैचारिक और कलात्मक आधार प्रदान किया। उनका उपन्यास ‘देवकी का बेटा’ केवल श्रीकृष्ण के जीवन की पुनर्कथा नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति, लोकतांत्रिक चेतना और मानवतावादी दृष्टि का आधुनिक पुनर्पाठ है। प्रस्तुत शोधपत्र में ‘देवकी का बेटा’ का जीवनीपरक उपन्यास की कसौटी पर मूल्यांकन किया गया है। इसमें उपन्यास के शीर्षक, कथानक, इतिहास-बोध, पौराणिक पुनर्व्याख्या, सांस्कृतिक परिवेश, इतिहास और कल्पना के संतुलन, चरित्र-चित्रण तथा लेखक की आधुनिक जीवन-दृष्टि का विश्लेषण किया गया है। रांगेय राघव ने कृष्ण के अलौकिक स्वरूप की अपेक्षा उनके मानवीय, संघर्षशील और जननायक रूप को प्रतिष्ठित किया है। इस प्रकार ‘देवकी का बेटा’ भारतीय सांस्कृतिक परम्परा और आधुनिक विवेकशील दृष्टि के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण सिद्ध होता है। | |
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Author(s):
संग्राम सिंह निराला, डॉ. बलजीत कौर.
Country:
India
Research Area:
हिन्दी साहित्य
Page No:
14-20 |
हिंदी दलित कहानियों में मानवाधिकार और सामाजिक संघर्ष : एक पुनर्व्याख्याAbstractयह शोध-पत्र समकालीन हिंदी दलित कहानी में अंतर्निहित सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और प्रतिरोध की चेतना का विस्तृत समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह स्पष्ट करता है कि दलित साहित्य केवल निष्क्रिय रुदन या सहानुभूति का साधन नहीं, बल्कि शोषितों की मानवीय गरिमा और अधिकारों की पुनर्प्राप्ति का मुखर वैचारिक आंदोलन है। डॉ. अंबेडकर के 'सामाजिक लोकतंत्र' दर्शन पर आधारित यह कथा-साहित्य मुख्यधारा की आदर्शवादी न्याय-संकल्पनाओं को खारिज कर भोगे हुए यथार्थ को बेबाकी से सामने लाता है। शोध में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय और सूरजपाल चौहान के माध्यम से प्रमाणित किया गया है कि यह साहित्य सामंती क्रूरता, आर्थिक वंचना और पुलिस-प्रशासन के पतन के विरुद्ध समानांतर 'जन-अदालत' की भूमिका निभा रहा है। आलेख दलित स्त्री-विमर्श की उन जटिलताओं को भी रेखांकित करता है, जहाँ स्त्री जातिवाद और पितृसत्ता के 'दोहरे अभिशाप' से लड़ते हुए अपने भौतिक अस्तित्व एवं अधिकारों के लिए अग्रिम मोर्चे पर खड़ी है। भाषाई स्तर पर यह अध्ययन 'भाषाई मानवाधिकार' की स्थापना करते हुए बताता है कि कुलीन एकाधिकार को तोड़कर ठेठ देशज शब्दों का प्रयोग भाषाई दरिद्रता नहीं, बल्कि शोषक समाज का नग्न यथार्थ है। समग्रतः यह शोध-पत्र हिंदी दलित कहानी को केवल रचनात्मक प्रवृत्ति न मानकर, हाशिए के समाज को जुबान देने वाले स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक एवं मानवाधिकार आंदोलन के रूप में स्थापित करता है। | |