| Paper Title |
लोकगीत में ऋतुगीतों का महत्त्व |
| Author(s) | डॉ. हेमलता कुमारी. |
| Country | India |
| Abstract |
लोकगीतों का प्रकृति के साथ गहरा संबंध है। लोकगीतों का जन्म तब हुआ, जब शहरी सभ्यता का विकास नहीं हुआ था और सामान्यतः लोग प्रकृति के प्रांगण में निर्द्वंद्व विचरण करते थे। भारतवर्ष में प्रकृति छह बार अपना रूप परिवर्तित करती है, जिससे ऋतु की संज्ञा दी जाती है। यहाँ छह ऋतुओं में ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमंत तथा बसंत हैं। हर ऋतु का अपना आनंद तथा महत्व है। भारतीय समाज सदियों से प्रत्येक ऋतु का जिन गीतों के माध्यम से स्वागत, सत्कार और अभिनंदन करता आया है, उन गीतों को ऋतु गीत कहते हैं। विशेष रूप से लोकगीतों का महत्व हमेशा बसंत और ग्रीष्म ऋतु से जुड़ा है। ऋतु गीतों में ऋतु विशेष में होने वाले उत्सव, त्योहारों, पर्वों एवं मेलों से संबंधित गीतों का वर्णन रहता है। प्रत्येक ऋतु के साथ मानव का बाह्य और आंतरिक परिवेश बदलता है। लोकगायक जहाँ बाहरी प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों का सूक्ष्म निरीक्षण कर अपनी कलम चलाता है, वहीं मानव मन पर पड़ने वाले प्राकृतिक परिवर्तन के प्रभाव को भी अंकित करता है। बसंत में शृंगार एवं हास्य, ग्रीष्म में वीर एवं रौद्र, वर्षा ऋतु में करुण एवं विरह, भयानक-वीभत्स तथा शरद में शांत और वात्सल्य रस का बाहुल्य लोकगीतों में रहता है। लगभग सभी भारतीय भाषाओं में बारहमासा लिखने की लोक परंपरा जीवित है। हिमाचल की विभिन्न बोलियों में भी इसका स्वरूप देखा जा सकता है। |
| Subject Area | संगीत |
| Issue | Volume 3, Issue 1 (January - March 2026) |
| Published | 2026/03/25 |
| How to Cite | हेमलता कुमारी (2026). लोकगीत में ऋतुगीतों का महत्त्व. Shodh Sangam Patrika, 3(1), 89–93. |
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